हम कितने
असहान फरामोश हैं
कि याद नहीं रखते
वे घटनायें भी
जिनका असर हमारे ही
जीवन पर पडता है।
यह भी कि हम इतने आम हैं
कि सुबह को घर से निकलें
तो शाम को हमारा घर लौट कर
आना तय नहीं है।
यह भी कि अगर हम या हममें से
कुछ अब तक साँस ले रहे हैं
तो उसका कारण हैं
हमारे प्रहरी,
हमारे सैनिक,
हमारे सिपाही।
26/11 की आतंकवादी घटना
पर
अब धूल पडने लगी है।
हम सामान्य होने लगे हैं।
हम भूलने लगे हैं
कि यह घटना शहादत की
बहुत सी कहानियों को समेटे है,
बहुत सी माओं की आँखें पत्थर हो गयी है
और बहुत सी बहनों के जीवन का
रंग सफेद हो गया है।
हाँ हम अहसान फरामोश हैं,
भूल जाते हैं
कि शहादत
कुछ परिवारों के दीपक बुझाती है,
तब हमारे घर के चिराग रौशन रहते हैं।
असहान फरामोश हैं
कि याद नहीं रखते
वे घटनायें भी
जिनका असर हमारे ही
जीवन पर पडता है।
यह भी कि हम इतने आम हैं
कि सुबह को घर से निकलें
तो शाम को हमारा घर लौट कर
आना तय नहीं है।
यह भी कि अगर हम या हममें से
कुछ अब तक साँस ले रहे हैं
तो उसका कारण हैं
हमारे प्रहरी,
हमारे सैनिक,
हमारे सिपाही।
26/11 की आतंकवादी घटना
पर
अब धूल पडने लगी है।
हम सामान्य होने लगे हैं।
हम भूलने लगे हैं
कि यह घटना शहादत की
बहुत सी कहानियों को समेटे है,
बहुत सी माओं की आँखें पत्थर हो गयी है
और बहुत सी बहनों के जीवन का
रंग सफेद हो गया है।
हाँ हम अहसान फरामोश हैं,
भूल जाते हैं
कि शहादत
कुछ परिवारों के दीपक बुझाती है,
तब हमारे घर के चिराग रौशन रहते हैं।
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