Saturday, 10 September 2016

शहादत

हम कितने 
असहान फरामोश हैं 
कि याद नहीं रखते 
वे घटनायें भी 
जिनका असर हमारे ही 
जीवन पर पडता है। 
यह भी कि हम इतने आम हैं 
कि सुबह को घर से निकलें 
तो शाम को हमारा घर लौट कर 
आना तय नहीं है। 
यह भी कि अगर हम या हममें से 
कुछ अब तक साँस ले रहे हैं 
तो उसका कारण हैं 
हमारे प्रहरी, 
हमारे सैनिक, 
हमारे सिपाही। 
26/11 की आतंकवादी घटना 
पर 
अब धूल पडने लगी है। 
हम सामान्य होने लगे हैं। 
हम भूलने लगे हैं 
कि यह घटना शहादत की 
बहुत सी कहानियों को समेटे है, 
बहुत सी माओं की आँखें पत्थर हो गयी है 
और बहुत सी बहनों के जीवन का 
रंग सफेद हो गया है। 
हाँ हम अहसान फरामोश हैं, 
भूल जाते हैं 
कि शहादत 
कुछ परिवारों के दीपक बुझाती है, 
तब हमारे घर के चिराग रौशन रहते हैं।

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव