Saturday, 10 September 2016

कैसा नपुंसक है

कैसा नपुंसक है 
यह देश, 
बर्फ हो जाता है। 
लगातार निर्दोष मारे जा रहे हैं। 
लगातार एक छद्म युद्ध 
शांति के कबूतर का 
गला घोंट रहा है। 
हम सीना ठोक कर कहते हैं 
कि हम बडे जान वाले लोग हैं, 
कल जहाँ गोलियाँ चली थी, 
आज वहीं से अपने ऑफिस के लिये निकले हैं। 
आह!! 
इस गफलत का करें क्या हम? 
हम अपने विकल्पहीन होने को भी 
गर्व का विषय बना लेते हैं 
और अपनी बेबसी पर तालियाँ पीट लेते हैं।

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव