Tuesday, 27 September 2016

दूसरी औरत ( रखैल )

जिसे जहाँ गलत नजरों से देखता
रखेल का ठप्पा लगाता है
जमाने भर की मोहब्बत वो लुटाती
अपनी मोहब्बत से जिन्दगी वो देती
सैलाभे गम से उबार कर लाती
चैनों अमन से जिन्दगी को सुगम वो करती
फिर भी जमाने की नजरों में ऱखैल कहलाती
अपना वजूद छिपाती
सर्वस्व महबूब पे लुटाती
कभी न सामने वो आती
रात के अंधेरे में
सैलाभे मोहब्बत से
जिन्दगी को रंगिनियों से सजाती
कभी किसी चीज की चाहत न करती
जब कभी बात न होती
सैलाभे अश्क बहाती
रोती बिलखती प्यार में अश्क बहाती
मोहब्बत ही जिन्दगी है
जिन्दगी ही मोहब्बत है
महबूब की चाहत में
पलक डगरों पे बिछाती
पूनम की रात
चंदा के सामने अश्क बहाती
जमाने भर का अपमान वो सहती
जमाने भर ताने वो सहती
मोहब्बत के अफसाने वो लिखती
पल पल आहें वो भरती
रोती बिलखती
मोहब्बत में जाँ की बाजी लगाती
फिर भी मेरी मोहब्बत
मेरी महबूब
मेरी जाने जनाना
कभी वो स्थान ही पाती
करवाँ चौथ का वृत वो करती
पति की मानिंद
जिन्दगी में स्थान वो देती
एक झलक महबूब की पाने
जमाने की खुशी वो पाती
फिर भी मेरी मोहब्बत
आखिर क्यों
दुसरी औरत है कहलाती

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