Saturday, 22 October 2016

मोहब्बतनामा

जिस्म की पाकीजगी नहीं
मोहब्बत में मसरूफ रूह का दीदार करता हूँ
दिल रूह जानों जिगर से
मोहब्बत मेरे सरकार करता हूँ
आदमियत का तकाजा है
इन्सानियत पे एतबार करता हूँ
दिल से सोचता हूँ
मोहब्बत भरे दिल से
मदहोश नही
होशों हवास मे स्वीकार करता हूँ
इबादते हुस्न तस्लीम करता हूँ
आशियाना ए दिल के
इबादत खाने में
महऱूज है
तस्वीर हुस्न यार की
गेसुओं का गजरा बनू
यही ख्वाहिश
मेरे महबूब है मेरी
तेरे जिस्म जहन में
खुशबू से मेरी
महके रूह कायनातों फिजा

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव