तनहाईयों सबब ए जिन्दगी हो गई हैं
जिन्दगी महबूब ए मोहब्बत की यादों में खो गई है
आशियाना ए दिल में यादों को सजोयें है
पल पल हरेक पल महबूब की यादों में खोये हैं
महबूब की डगर में पलकें बिछाए बैठें हैं
आशियाना ए दिल में उनकी यादें सजायें बैठे हैं
भला कैसे भूल जाऊ वो स्वर्णिम लमहें
जो गुजारे थे उनकी जुल्फों के शामियाने में
अमावस्या की रात जब मेरे महबूब निकला चैबारे
यू लगा जैसे पूनम की चाँदनी ने शबनमी मोतियों से सजाया उनकों
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