Thursday, 27 October 2016

निशा

निशा का तिमिर हरण किया
रवि की पावन किरणों ने
जिन्दगी जहाँ रौशन हुई
रौशन हुई कायनातों फिजा
मन के आँगन का तिमिर हरण हुआ
दिव्य ग्यान की पावन वाणी से
तनहाईयों से मन मुक्त हुआ
जब दीदारे यार हुआ पृभात बेला में
महबूबे मोहब्बत की डगर महक गई
बसंती पावन झोकों से
मन मस्तिष्क पसन्न हुआ
जब पाया साथ तेरा
संध्या की पावन बेला आई
हुई बिदाई रवि किरणो  की
निशा ने दामन थाम संध्या को साथ लिया
फिर वही तनहाईयाँ
फिर चंदा का पावन साथ
मोहब्बत भरी जिन्दगी महकी
जब हुई पूऩम की चाँदनी से मुलाकात
शबनमी मोतियों से वसुन्धरा जगमगाई जब हुई चाँदनी से मुलाकात
महबूबे मोहब्बत का दीदार हुई दिल से दिल की बात

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव