मोहब्बत की अर्ज तुम्हारी
क्या कभी तुमने कोई
पृयास किया
मुझसे से मिलने का
तुम्ही बताओ इसमें मेरी गल्ती क्या है
मै तो मोहब्बत का प्यासा
एक अंजान पथिक
कब से डगर तुम्हारी निहारता
पथरा सी गई मेरी अँखिंया
अब तो आन मिलों पृियतम
हर उपवन मैने घूमा
वन वन भटका तुम्हें न पाया
उपवन की नन्हीं कलियों से पूछा
कहीं न तुमकों मैंने पाया
डगर डगर भटका अंजान पथिक
कहीं न तुमको मैने पाया
तुम्हारी मोहब्बत की महक
आज भी जहन में बाँकी है
सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत की चाहत मे
अपना जीवन मैने बिताया
कहीं न मिली मोहब्बत की महक
कहीं किसी डगर न तुमको मैने पाया
अब और इन्तजार मुश्किल हो गया
साथ नही देती मेरी काया
उसी नीम की मादक छाँव में
जहाँ पहले पहल दीदारे यार किया था
अपने जीवन का लम्हा लम्हा तुम्हारी
मोहब्बत की चाहत मे मेरे सनम
कसम तुम्हारी मोहब्बत की
मैने आज तलक बिताया
मेरा पृेम मेरी मोहब्बत
तुम्हारी मोहब्बत में ऐसे तडपता
ज्यों जल बिन चंचल मछुरियाँ
मेरा मुकद्दर मेरी चाहत
तुम्ही तो हो पृियतम
मै तुम्हारी मोहब्बत में पागल
सारे जहाँ को मैने भुलाया
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत में
फिर भी पृियतम
आज तलक तुमको न मैने पाया
आज भी तुम्हारा
तुम्हारी मोहब्बत का
एतबार है दिल को
इन्तजार है पृियतम तुम्हारा
आन मिलो पृियतम
ये इन्तेहा है इन्तजार की
अब और न तडपाओ
आ भी जा , आ भी जा
रूह को अब भी इन्तजार है
दीदारे यार का
इन अँखिंयों की प्यास
दीदारे यार से ही बुझेगी पृियतम
मनोहर यादव "अमृत सागर "
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