Monday, 21 November 2016

मोहब्बत की अर्ज

मोहब्बत की अर्ज तुम्हारी
क्या कभी तुमने कोई
पृयास किया
मुझसे से मिलने का
तुम्ही बताओ इसमें मेरी गल्ती क्या है
मै तो मोहब्बत का प्यासा
एक अंजान पथिक
कब से डगर तुम्हारी निहारता
पथरा सी गई मेरी अँखिंया
अब तो आन मिलों पृियतम
हर उपवन मैने घूमा
वन वन भटका तुम्हें न पाया
उपवन की नन्हीं कलियों से पूछा
कहीं न तुमकों मैंने पाया
डगर डगर भटका अंजान पथिक
कहीं न तुमको मैने पाया
तुम्हारी मोहब्बत की महक
आज भी जहन में बाँकी है
सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत की चाहत मे
अपना जीवन मैने बिताया
कहीं न मिली मोहब्बत की महक
कहीं किसी डगर न तुमको मैने पाया
अब और इन्तजार मुश्किल हो गया
साथ नही देती मेरी काया
उसी नीम की मादक छाँव में
जहाँ पहले पहल दीदारे यार किया था
अपने जीवन का लम्हा लम्हा तुम्हारी
मोहब्बत की चाहत मे मेरे सनम
कसम तुम्हारी मोहब्बत की
मैने आज तलक बिताया
मेरा पृेम मेरी मोहब्बत
तुम्हारी मोहब्बत में ऐसे तडपता
ज्यों जल बिन चंचल मछुरियाँ
मेरा मुकद्दर मेरी चाहत
तुम्ही तो हो पृियतम
मै तुम्हारी मोहब्बत में पागल
सारे जहाँ को मैने भुलाया
सिर्फ और सिर्फ तुम्हारी मोहब्बत में
फिर भी पृियतम
आज तलक तुमको न मैने पाया
आज भी तुम्हारा
तुम्हारी मोहब्बत का
एतबार है दिल को
इन्तजार है पृियतम तुम्हारा
आन मिलो पृियतम
ये इन्तेहा है इन्तजार की
अब और न तडपाओ
आ भी जा , आ भी जा
रूह को अब भी इन्तजार है
दीदारे यार का
इन अँखिंयों की प्यास
दीदारे यार से ही बुझेगी पृियतम

मनोहर यादव "अमृत सागर "

No comments:

Post a Comment

खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव