Friday, 25 November 2016

कस्तूरी

मोहब्बत से महकता है कायनातों फिजा
शबनमी चाँदनी के मोतियों से सजती है वसुन्धरा
फूलों की महक से महकती है कायनात
अम्बर के सितारों से दुघियाँ सी लगती अमावस की रात
सहरा महकने लगते है मृग की नाभी में बसी कस्तुरी से
मृग महक से बावला होकर सहराओं में सतत दौडता रहता है
कभी न कस्तूरी अंजान मृग पाता है
महकती डगर पर थक हार के जब बैठता है
कस्तूरी की मादक महक से कायनातों फिजा को महकाता है
सारे जहाँ की उदासी पलक झपकते दूर होती है
दिल का उपवन मोहब्बत की महक से रौशन हो जाता है

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव