Monday, 26 December 2016

तुम्हारी कृति

इतना हक हे चाहत हमारी
ये कहने का हक कृतिका मुझे दे दो
चाहें बदले में ले लो जिन्दगानी हमारी
तुम्हारी रूबाईयाँ लगती है प्यारी
महकती सी लगती है जैसे फुलवारी
चाँदनी के शबनमी मोतियों की जैसे पूनम से यारी
हरेक संय मे नजर आती है मोहक छवि तुम्हारी
अब और दुरियों को पूर्ण विराम तुम दे दो
जिन्दगी में कोहरा घना छा गया है
इसे अल्प विराम तुम दे दो
महकती हुई जिन्दगी थी इसे वापस मुस्कान तुम दे दो
मनोहर यादव " अमृत सागर "

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव