कुँज गलिन में गूँजत किलकारी
नंदलला कान्हाई अवधबिहारी
महकत माटी चहकत हवाँ गुँजत
मोहनी धुन साँवरियाँ की बाँसुरिसा मतवारी
महकत माटी ज्यों माखन मिसरी
यु लगत जमुना के तट खेलत बाँके बिहारी
तरस गई मेरी दऊ अँखियाँ
दरस को तेरे गिरीधारी
अजहूँ निहारत डगर तिहारी
मनोहर सखा गिरीधारी
अब तो आजा मेरे साँवरियाँ
सुदामा सखा गिरीधारी
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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