Friday, 13 January 2017

श्याम सखा

कुँज गलिन में गूँजत किलकारी
नंदलला कान्हाई अवधबिहारी
महकत माटी चहकत हवाँ गुँजत
मोहनी धुन साँवरियाँ की बाँसुरिसा मतवारी
महकत माटी ज्यों माखन मिसरी
यु लगत जमुना के तट खेलत बाँके बिहारी
तरस गई मेरी दऊ अँखियाँ
दरस को तेरे गिरीधारी
अजहूँ निहारत डगर तिहारी
मनोहर सखा गिरीधारी
अब तो आजा मेरे साँवरियाँ
सुदामा सखा गिरीधारी

मनोहर यादव " अमृत सागर "

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव