जिन्दगी में बहारे आती हैं चली जाती हैं
नग्मात ए मोहब्बत फिजा महकाती हैं
चहकती है कभी कुहुकती है जिन्दगी
कभी दरियाए अश्क हो जाती है जिन्दगी
मेरे महबूब से जिन्दगी सावन की मानिंद है
बिन महबूबे मोहब्बत के सहराओ में भटकता ख्वाब है
महबूब से जिन्दगी में बहार है
महबूब सागर में नाविक की पतवार है
महबूब से सहराओ में महकती बयार है
महबूब सावन की मादक महकती फुहार है
महबूब जिन्दगी में शबनमी बहार है
महबूब से ही तो है जिन्दगी महबूब रूप सिंगार है !
मनोहर यादव " अमृत सागर "
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