Saturday, 4 March 2017

एक आम औरत

एक आम स्त्री सामाजिक बंधनों के मकडजाल में जकडी
वो बहन किसी और किसी की बेटी
औरत वह किसी मर्द के आगोष में लेटी
माँ बनके वसुन्धरा के मानिंद फर्ज अपना निभाती
सैनिक बन सीमा पर माँ वसुन्धरा का कर्ज चुकाती
अध्यापिका बनके वह देश का भविष्य बनाती
डाक्टर बनके वह देश वाशियों की जीवन दायिनी कहलाती
किचन में कुक बनके सबका खाना बनाती
दुध अपना पिलाकर भारत का भविष्य बनाती
सब कुछ वह करती ९ माह गर्भ से बालक जनती
दुर्गा बनके महिषी का संहार कर देवों को बचाती
फिर भी परिचय के नाम पर साधारण हाउस वाईफ कहलाती
हँसते हँसते हर दुख सहती जिन्दगी को गले लगाती
बाबुल के आँगन से लेकर ससुराल तक फर्ज ऩिभाती
बाल अवस्था यौवनावस्था अंतत: वृद्धावस्था जी जन्म सफल बनाती
कहीं तीन तलाक का दुख वो झेलती द:ख के दरियाँ में गोते लगाती
कहीं समाज के ठेकेदारों के हत्थे चढ वैशाली की नगर वधू बन जाती
सावित्री बन यम से पति के पृाण सहज बचाती
नारी ममता की सहज मूर्ती रिश्तों का फर्ज ताउमृ सहज निभाती !

मनोहर यादव "अमृत सागर "

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव