एक आम स्त्री सामाजिक बंधनों के मकडजाल में जकडी
वो बहन किसी और किसी की बेटी
औरत वह किसी मर्द के आगोष में लेटी
माँ बनके वसुन्धरा के मानिंद फर्ज अपना निभाती
सैनिक बन सीमा पर माँ वसुन्धरा का कर्ज चुकाती
अध्यापिका बनके वह देश का भविष्य बनाती
डाक्टर बनके वह देश वाशियों की जीवन दायिनी कहलाती
किचन में कुक बनके सबका खाना बनाती
दुध अपना पिलाकर भारत का भविष्य बनाती
सब कुछ वह करती ९ माह गर्भ से बालक जनती
दुर्गा बनके महिषी का संहार कर देवों को बचाती
फिर भी परिचय के नाम पर साधारण हाउस वाईफ कहलाती
हँसते हँसते हर दुख सहती जिन्दगी को गले लगाती
बाबुल के आँगन से लेकर ससुराल तक फर्ज ऩिभाती
बाल अवस्था यौवनावस्था अंतत: वृद्धावस्था जी जन्म सफल बनाती
कहीं तीन तलाक का दुख वो झेलती द:ख के दरियाँ में गोते लगाती
कहीं समाज के ठेकेदारों के हत्थे चढ वैशाली की नगर वधू बन जाती
सावित्री बन यम से पति के पृाण सहज बचाती
नारी ममता की सहज मूर्ती रिश्तों का फर्ज ताउमृ सहज निभाती !
मनोहर यादव "अमृत सागर "
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