१०८ मेरी आधुनिक मधुशाला
भेष बदलकर सुर बन साकी आज आये मेरी आधुनिक मधुशाला
जन्नते हर रम्भा से सुन्दर रूपसी देख सुर चकराये पीके हाला
सुरबाला की अमृतसम सागरमय पी स्वाद अमृत का भुलाया
जन्नत से भी सुन्दर मधुशाला धरा पे देख सुरों का माथा चकराया
भेष बदलकर सुर बन साकी आज आये मेरी आधुनिक मधुशाला
जन्नते हर रम्भा से सुन्दर रूपसी देख सुर चकराये पीके हाला
सुरबाला की अमृतसम सागरमय पी स्वाद अमृत का भुलाया
जन्नत से भी सुन्दर मधुशाला धरा पे देख सुरों का माथा चकराया
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