Saturday, 11 June 2016

१०८ मेरी आधुनिक मधुशाला

१०८   मेरी आधुनिक मधुशाला

भेष बदलकर सुर बन साकी आज आये मेरी आधुनिक मधुशाला
जन्नते हर रम्भा से सुन्दर रूपसी  देख सुर चकराये पीके  हाला
सुरबाला की अमृतसम सागरमय पी स्वाद अमृत का भुलाया
जन्नत से भी सुन्दर मधुशाला धरा पे देख सुरों का माथा चकराया

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव