Saturday, 9 July 2016

२६७ - मेरी आधुनिक मधुशाला

२६७ - मेरी आधुनिक मधुशाला

कभी न मुख से मांगके मैंने पी नहीं अमृतसम मादक हाला
परदेशी अंजान नहीं कोई सदियों से पीता आया मादक हाला 
अपने दिल के भेद सभी दूर करो कमसिन अल्हड सुरबाला
मेरे शबनमी सात सुरों से आज गूंज उठेगी मेरी मधुशाला 

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खामोशियो की सागिर्दगी

खामोशियो की सागिर्दगी सबब ए जिन्दगानी यार है । तनहाइयो में तेरी मोहब्बतो यादें सनम एतबार हैं ।  मनोहर यादव