२६७ - मेरी आधुनिक मधुशाला
कभी न मुख से मांगके मैंने पी नहीं अमृतसम मादक हाला
परदेशी अंजान नहीं कोई सदियों से पीता आया मादक हाला
अपने दिल के भेद सभी दूर करो कमसिन अल्हड सुरबाला
मेरे शबनमी सात सुरों से आज गूंज उठेगी मेरी मधुशाला
कभी न मुख से मांगके मैंने पी नहीं अमृतसम मादक हाला
परदेशी अंजान नहीं कोई सदियों से पीता आया मादक हाला
अपने दिल के भेद सभी दूर करो कमसिन अल्हड सुरबाला
मेरे शबनमी सात सुरों से आज गूंज उठेगी मेरी मधुशाला
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