सखी बसंत आयो
मुस्काई चंचल मोरनी
अमुआ के बोर ने मन भरमायों
खिलत नित नव कोपल
अंग अंग है भरमायो
सखी सुन बसंत
सिर पे पाव धरके आयो
मनवा मा उमंग उठी
पिय मिलन की सखी
बैरी हिय को दरद बढायों
काम वेदना अब सही नही जाय
बसंत ने जे कैसो रोग लगायो
हियरा में सखी शूल चूभत है
बेदर्दी ने जे कैसों रोग लगायो
पलाश ने वसुन्धरा की मांग सजाई
दुगनो रोग भडकायों
महुआ की मादक महक ने
हियरा में अगन लगायो
मोहे एसो भान होत है
काम रति ढिंग
वसुन्धरा पे सखी आयों
सखी बसंत आज आयो !
मनोहर यादव " अमृत सागर "